
उग्र सवभाव ने बनाया पूर्वी नंदादेवी को सबसे दुर्गम चोटी
अपने उग्र स्वाभाव के कारण पूर्वी नंदादेवी चोटी पर्वतारोहियों के लिए दुर्लभ बनी हुई है. यहाँ अब तक कई अभियान चले लकिन बिरले ही एस चोटी पर चड़ने में सफल हो सके. पूर्वी नंदादेवी अभियान के दौरान दर्जनों पर्वतारोही अपनी जान गवा चुके है.
उत्तराखंड की सबसे दुर्गम चोटी नंदा देवी है. एस चोटी पर पहुचने का दुर्गम सफर परवातारोहियो के लिए आज भी चुनोती बना हुआ है.
एस घटना के २४ साल बाद १९७५ में भारत -फ्रेंच का १३ सदस्यीय सयुक्त परवातारोही दल मुख्य व पूर्वी नंदा देवी अभियान को निकला. लेकिन यह दल असफल रहा. इसके बाद १९८१ में भारतीय सेना ने मुख्य व पूर्वी नंदा देवी पर सफलतापूर्वक चढाई की, लेकिन लौटते समय दल के प्रमुख सदस्य प्रेमजीत लाल,फुदोर्गी, दया चाँद, राम सिंह, लाखा सिंह मारे गए. इस अभियान के बाद १९९१ में भारत-रूस के १४ सदयीय दल ने पूर्वी नंदा देवी पर चड़ने में सफलता पाई. इस अभियान में १० रुसी व ४ भारतीय सदस्य मौजूद थे. २००५ में ९ सदस्यीय इटालियन टीम मार्को पाउलो के नेतृत्व में नंदा देवी (ईस्ट) अभियान में
पर्वतारोही व कई चोटी फतह कर चुके सुमित गोयल ने बताया की किसी भी पर्वत पर चड़ने से पहले उसके स्वभाव को जानना अहम् होता है. पूर्वी नंदा देवी चोटी का स्वभाव सभी हिमालयी चोटियों में सबसे उग्र है. यहाँ हर समय बड़ी तेजी से मौसम बदलता है, जिस कारण इस चोटी में चड़ना आज भी चुनौती बना हुआ है. उन्हने बताया की १९८२ में नंदा देवी के पश्चिमी भाग को अभ्यारण्य घोषित कर दिए जाने के बाद पर्वतारोहियों के लिए दक्षिण पश्चिमी मार्ग बंद कर दिया
पूर्वी नंदा देवी चोटी पर प्रमुख अभियान
· १९३९ में
· १९५१ में फ्रेंच पर्वतारोही दल के ३ सदस्य लापता.
· १९७५ में भारत-फ्रांस का सयुक्त पर्वतारोहण असफल.
· १९८१ में भारतीय सेना का अभियान सफल, ५ की मौत
· १९९१ में भारत-रूस का सयुक्त पर्वतारोहण सफल
· २००५ में
· २००६ में
· २००७ में भारतीय सेना का अभियान असफल, ५ की मौत