· उत्तराखंड के पिथोरागढ़ व चम्पावत जिले में कुल ५२६ है इनकी आबादी
उत्तराखंड के पिथोरागढ़ व चम्पावत जिले में निवास कराने वाली आदिम जनजाति वनराजी आज विलुप्ति के कगार पर है. वन राजियोँ में मृत्यु दर अधिक होने के कारण इनके आबादी लगातार घटती जा रही है. अगर समय रहते कोई कारगर कदम नही उठाए गए तो विसिस्ट सामाजिक, सांस्कृतिक, एतिहासिक विसिस्त्ताए सजोए आदिम जनजाति एक दिन विलुप्त हो जाएगी.
भारत में ४२७ जनाजातीया निवास कराती है, इन जनजातियों में से ७४ को आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त है. ऐसी ही एक आदिम जनजाति वनराजी मध्य हिमालयी राज्य उत्तराखंड में निवास कराती है. वन राजियोँ को १९६७ में जनजाति का दर्जा दिया गया और १९७५ में आदिम जनजाति की क्षरेद्नी में शामिल किया गया. वनराजी उत्तराखंड के दो जिलों पिथोरागढ़ के किमखोला, गैनागोँ, चिपल्तारा, भिक्तारुवा, कुताचुरानी, कत्युला, मदनपुरी, जमातादी, औलात्दी व चम्पावत जिले में खिर्द्वारी नमक स्थान पर निवास करते है. इन दो जिलों में इनके १४३ परिवार निवास करते है, जिनकी आबादी ५९२ है. वन राजियोँ में मृत्यु दर अदिक होने के कारण आज लगातार खत्म होने के कगार पर है. ७० प्रतिसत बच्चे आज भी पैदा होते ही मर जाते है. जो बच जाते है वह कुपोषण , भूख, प्राकृतिक आपदा आदि से असमय काल के ग्रास बन जाते है.
वन राजियोँ के निवास स्थान मुख्या सदका से १५ से २५ किलोमीटर दूर है. मुख्यधारा से कटे होने के कारंद ये मूलभूत सुविधाओं बिजली, पानी, सड़क से कोसों दूर है. सरकार द्वारा कोई ध्यान न देने के कारण वनराजी अपने अस्तित्व को बचने के लिए ख़ुद से ही संघर्ष कर रहे है. आज भी कई वनरावत परिवार गुफाओं में निवास करते देखे गए है.
वन राजियोँ में शिक्षा व जनजागरुकता का पूर्णतया अभावा है. वन राजियोँ का कोई भी बच्चा उच्चा सिक्षा ग्रहण नही कर पाया है. जनजागरुकता के अभाव में शोषण, उत्पीडन अपने चरम पर है. मुख्यधारा से कटे होने के कारण ये कभी भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष नही करते है.
आधुनिक युग में वन रावातोँ के विलुप्ति का प्रमुख कारण बिना अधययन के सरकारी योजनाओ का क्रियान्वयन करना है. वनराजी जनजाति परंपरागत रूप से वनों पर निर्भर है. लेकिन जंगलों से अधिकार छिनने के बाद से इनका अस्तित्व खतरे में पड़ गया है. जंगल ही इनके समाज, संस्कृति, अर्थाव्यावस्था का प्रमुख हिस्सा है. जंगलों से अधिकार छिनने के बाद इनकों मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कई सरकारी व गैर सरकारी योजनाई चलाई गई. अनुकूलन न होने के कारण ये योजनाये धरातल पर नही उतर पाई. आज भी ये अपने को बचने के लिए ख़ुद से संघर्ष कर रहे है. अगर समय रहते कोई कारगर कदम नही उठाई गई तो वह दिन दूर नही जब यह जनजाति इतिहास के पन्नों पर सिमट जायेगी.
इतिहास
उत्तराखंड के पिथोरागढ़ व चम्पावत जिले में निवास कराने वाली आदिम जनजाति वनराजी आज विलुप्ति के कगार पर है. वन राजियोँ में मृत्यु दर अधिक होने के कारण इनके आबादी लगातार घटती जा रही है. अगर समय रहते कोई कारगर कदम नही उठाए गए तो विसिस्ट सामाजिक, सांस्कृतिक, एतिहासिक विसिस्त्ताए सजोए आदिम जनजाति एक दिन विलुप्त हो जाएगी.
भारत में ४२७ जनाजातीया निवास कराती है, इन जनजातियों में से ७४ को आदिम जनजाति का दर्जा प्राप्त है. ऐसी ही एक आदिम जनजाति वनराजी मध्य हिमालयी राज्य उत्तराखंड में निवास कराती है. वन राजियोँ को १९६७ में जनजाति का दर्जा दिया गया और १९७५ में आदिम जनजाति की क्षरेद्नी में शामिल किया गया. वनराजी उत्तराखंड के दो जिलों पिथोरागढ़ के किमखोला, गैनागोँ, चिपल्तारा, भिक्तारुवा, कुताचुरानी, कत्युला, मदनपुरी, जमातादी, औलात्दी व चम्पावत जिले में खिर्द्वारी नमक स्थान पर निवास करते है. इन दो जिलों में इनके १४३ परिवार निवास करते है, जिनकी आबादी ५९२ है. वन राजियोँ में मृत्यु दर अदिक होने के कारण आज लगातार खत्म होने के कगार पर है. ७० प्रतिसत बच्चे आज भी पैदा होते ही मर जाते है. जो बच जाते है वह कुपोषण , भूख, प्राकृतिक आपदा आदि से असमय काल के ग्रास बन जाते है.
वन राजियोँ के निवास स्थान मुख्या सदका से १५ से २५ किलोमीटर दूर है. मुख्यधारा से कटे होने के कारंद ये मूलभूत सुविधाओं बिजली, पानी, सड़क से कोसों दूर है. सरकार द्वारा कोई ध्यान न देने के कारण वनराजी अपने अस्तित्व को बचने के लिए ख़ुद से ही संघर्ष कर रहे है. आज भी कई वनरावत परिवार गुफाओं में निवास करते देखे गए है.
वन राजियोँ में शिक्षा व जनजागरुकता का पूर्णतया अभावा है. वन राजियोँ का कोई भी बच्चा उच्चा सिक्षा ग्रहण नही कर पाया है. जनजागरुकता के अभाव में शोषण, उत्पीडन अपने चरम पर है. मुख्यधारा से कटे होने के कारण ये कभी भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष नही करते है.
आधुनिक युग में वन रावातोँ के विलुप्ति का प्रमुख कारण बिना अधययन के सरकारी योजनाओ का क्रियान्वयन करना है. वनराजी जनजाति परंपरागत रूप से वनों पर निर्भर है. लेकिन जंगलों से अधिकार छिनने के बाद से इनका अस्तित्व खतरे में पड़ गया है. जंगल ही इनके समाज, संस्कृति, अर्थाव्यावस्था का प्रमुख हिस्सा है. जंगलों से अधिकार छिनने के बाद इनकों मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कई सरकारी व गैर सरकारी योजनाई चलाई गई. अनुकूलन न होने के कारण ये योजनाये धरातल पर नही उतर पाई. आज भी ये अपने को बचने के लिए ख़ुद से संघर्ष कर रहे है. अगर समय रहते कोई कारगर कदम नही उठाई गई तो वह दिन दूर नही जब यह जनजाति इतिहास के पन्नों पर सिमट जायेगी.
इतिहास
इतिहासकर व लेखक वन राजियोँ को किरात वंशीय मानते है, जो मंगोल जाती से सम्बंधित है. वन रावातोँ का कभी पूर्वी हिमालय में साम्राज्य था. किरातार्जुनीय के अनुसार उन्होंने धनुर्धारी अर्जुन को परास्त किया था. लेकिन वन राजियोँ का यह गौरवमयी इतिहास आज खत्म होने की कगार पर है.




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