Sunday, September 13, 2009

uttarakhand


बढते पलायन ने बदला पहाड़ का राजनैतिक भूगोल

पिछले पाँच सालो में पर्वतीय क्षेत्रो की घटी आबादी
• राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक रूप से कमजोर हो रहे पहाड़ का कोई नही है सुधलेवा


हाड़ से लगातार हो रहे पलायन से जहाँ गाँव के गाँव वीरान हो गए है, वही इसने पहाड़ के संसदीय क्षेत्रो का भूगोल बदल दिया है. इस लोकसभा चुनाव में पहाड़ के लोकसभा सीटों के मानको को पूरा करने के लिए दूसरे क्षेत्रो के विधानसभा क्षेत्र को जोड़ा गया है. विशेषज्ञों का मानना है की अगर पहाड़ से ऐसे ही पलायन बढता रहा तो, जहा नए परिसीमन से पहाड़ की सीटें घट गई है, वही २०२५ में होने वाले लोकसभा पुनर्गठन से पहाड़ की लोकसभा सीटें बढने के बजाय घट जायेगी.
बढते पलायन के कारण पहाड़ राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक रूप से लगातार कमजोर होते जा रहा है. एक अध्ययन के अनुसार प्रदेश के पर्वतीय जिलो पिथोरागढ़, चम्पावत, बागेश्वर, टीहरी, पौडी , अल्मोरा, बागेश्वर, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग , नैनीताल आदि से प्रतिवर्ष लगभग ४० हजार लोग पलायन कर रहे है. यह संख्या घटने के बजाय लगातार बढती जा रही है. राजनैतिक रूप से देखें तो पहाड़ लगातार कमजोर होते जा रहा है. परिसीमन के बाद जहा पहाड़ की सीटें घट गई है, वही इसका प्रभाव प्रदेश की पांचों संसदीय क्षेत्रों में भी देखने को मिला. २००९ के लोक सभा चुनाव में बढते पलायन ने पाँचों संसदीय क्षेत्रों का भूगोल ही बदल दिया है. अगर पलायन पर गौर करे तो स्थिति अपने आप ही साफ हो जाती है। अल्मोरा -पिथौरागढ़ संसदीय क्षेत्र में पिछले पाँच सालों में १९,१०८ मतदाताओ ने पहाड़ छोड़ दिया है. पौडी संसदीय क्षेत्र से २० हजार, टिहरी लोकसभा से १६ हजार मतदाता पलायन कर चुके है। नैनीताल लोकसभा सीट की बात करे तो यहाँ के ७० फीसदी मतदाता भाबर क्षेत्र में निवास करते है. अगर पूरे प्रदेश के मतदाताओं की संख्या पर गौर करे तो ५३ फीसदी मतदाताओ की संख्या अकेले तीन जिलों हरिद्वार, उधमसिह नगर व देहरादून में है. जबकि पहाड़ के १० पर्वतीय जिलों में इनकी संख्या २७ लाख ही रह गई है.
पहाड़ के पलायन पर अध्ययन कर रहे प्रोफेसर रघुवीर चंद्र ने बताया की जिस पर्वतीय राज्य की अवधारना को लेकर राज्य का निर्माण किया गया था वह सिद्धांत खत्म होते जा रहा है. पहले परिसीमन से पहाड़ की ६ विधानसभा सीटें कम हो गई है, अब लोकसभा सीटें सिकुड़ती जा रही है। अगर पहाड़ से इसी तरह पलायन बढता रहा तो आगामी लोकसभा पुनर्गठन में पहाड़ की सीटें बढने के बजाय घट जायेगी.
लगातार बढ रहे पलायन से पहाड़ के पहाड़ खाली हो गए है। गाँवों के खाली होने से सामाजिक ताना बाना भी कमजोर हुआ है. जिसने की अर्थव्यवस्था की नींव हिला दी है. पत्रकार बीड़ी कसनियाल ने बताया की राज्य बनने के बाद से किसी भी सरकार ने पहाड़ की सबसे ज्वलंत समस्या पलायन की ओर कोई ध्यान नही दिया. सरकार के प्रतिनिधि पहाड़ को बचाने में असफल ही दिखाई दिए है.

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