Saturday, October 10, 2009
mahasir
महासीर का लुप्त होना, हिमालयी नदियों के ख़त्म होने का संकेत
*अगले ५० वरसों में सूखा जायेगी अदिकांस हिमालयी नदिया
* हिमालयी नदियों में पाई जाने वाली मछ्लियोँ की ४१ प्रजातीय संकटग्रस्त
अवैध सीकर, बेतहासा निर्माण कार्य, प्रयावार्निय कचरा आदि का असर अब समुद्रों, नदियों में पाए जाने वाले जल्चारोँ में भी दिखाई देने लगा है. एक अधययन के अनुसार समुद्र में पाई जाने वाली एक-तिहाई मचलिया ख़त्म हो गई है. इसके दुस्प्रभाव से हिमालयी नदिया भी नही बच्च पाई है. हिमालयी नदियों में मचलियोँ की ४१ प्रजातिया पाई जाती है, लगभग सभी प्रजातीय संकटग्रस्त है. हिमालयी नदियों में सबसे अधिक संकात्ग्रस्त महासीर मचली है. वैज़निकोँ का मानना है की महासीर का लुप्त होना हिमालयी नदियों के ख़त्म होने का संकेत है. अगर लुप्त होती हुई महासीर मछली को बचाया नही गया तो अगले ५० वर्षों में हिमालय से निकलने वाली अदिकंसा नदियाँ भी ख़त्म हो जैगी.
महासीर मछाली प्रायः सभी हिमालयी नदियों में पाई जाती है। यहाँ इसकी दो प्रजातिया पाई जाती है. पहली तोर्टर व दूसरी तोर्पितितोरा महासीर. तोर्टर, तोर्पितितोरा महासीर मछली से चोटी होती है. महासीर मछली सुनहरे पीले रंग की होती है. इसका वजन १५ से ५० किलो व लम्बाई एक फिट से ३ फिट तक होती है. महासीर का प्रजनन काल अप्रैल से सितम्बर तक होता है.आज हिमालयी नदियों से महासीर लगभग समाप्त हो गई है. सरकार द्वारा महासीर मच्चालियोँ के सिकार पर प्रतिबह्धा लगने के बाद भी इसका अवैध शिकार जरी है.
हिमालियोँ मच्चालियोँ मुक्य रूप से महासीर के लुप्त होने का परमुखा कारन बेतहासा अवैध सीकर, मच्चालियाँ पकड़ने के लिए बिस्फोताकाओं का प्रयोग, प्रजनन के समय नदियों से अवैध खनन, बड़े-बड़े बाधाओं का निर्माण आदि है. वैज़निकोँ का मानना है की महासीर का मन्ना है की महासीर का प्रजनन कल अप्रैल से सितम्बर में होता है, प्रजनन के बाद यह अपने अंडे देने नदियों के किनारे, बालू या जादी के पास आते है. लेकिन इस समय नदियों से अवैध खनन भी होता है, जिस से इनके अंडे सुरक्षित नही रह पते और बच्चे नही बच पते. वही बड़े-बड़े बधोँ के निर्माण से महासीर मछलियाँ एक एस्थान से दुसरे एस्थान तक नही जा पते है. मचलिया अपने जीवन कल में प्रजनन के समय अंडे देने के लिए घरे पानी से किनारे की और आते है, बड़े-बड़े बाँधा एस प्रक्रिया में बाधा बनते है. जिस कारण मछलिया अपना वंश नही बड़ा पति है. जो महासीर की विलुप्ति का प्रमुख कारण है.
कुमाओं विस्वविधालय के जिव वैजानिक दा. अस अस पतनी ने बताया की महासीर के ख़त्म होने का कारण पर्यावरण में बरते मानव हस्तक्षेप के साथ विदेसी मच्चालियोँ का हमारी नदियों में प्रवेश करना है. एन विदेसी मच्चालियोँ की प्रजातियोँ में मुख्य रूप से थैमन्गोअन, मिरर कार्प, सिल्वर कार्प आधी प्रमुख है. एन मच्चालियोँ के हिमालयी नदियों में आने से इसका असर महासीर की खाध्य श्रृखला में पड़ा है. थैमंगो जैसे विदेसी प्रजाति की मच्चालियोँ तो महासीर को अपना सीकर बनता है. मत्स्य विसेसगाया व जिव वैजानिक कुमकुम सह ने बताया की महासीर के लुप्त होने का असर जैव विविधता व पारिस्थितिकीय तंत्र पर पड़ रहा है. जिस प्रकार महासीर लुप्त हो रहे है वह भयानक संकट की और एसर कर रहे है. उन्होंने बताया की जहा एक और नदियों का पारिस्थितिकीय तंत्र इससे प्रभावित हो रहा है वही नदियों के सुखाने की प्रक्रिया भी सुरू हो रही है. महासीर मच्चालिया नदियों के जल एस्टर के कम या ज्यादा होने की सूचना भी देते है. महासीर के लुप्त होने का मतलब नदियों का लगातार ख़त्म होना है. अगर समय रहते युध एस्टर पर कार्य नही किया गया तो भयंकर दुस्परिनाम भुघताने परेंगे. राज्य मत्स्य विकास अबिकरण की सदस्य जोयती सह मिश्रा ने बताया की महासीर को बचने के लिए युध एस्टर पर कार्य किए जा रहे है, जल्द ही इसके परिणाम सामने आयेगे.
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment