सहेजना
उत्तराखंड को पुराणों में देवताओं की भूमि कहा गया है, और इसकी पहचान यहाँ के देवालय है. लेकिन आजकल बनने वाले मन्दिर अपना पर्वतीय स्वरुप खोते जा रहे है. पुरानी पहाडी शैली के मंदिरों की जगह अब ईट, मार्बल व ता एल्ससे बने मंदिरों ने ले ली है. देवालायाओं के लगातार बदलते स्वरुप से पहाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पार खतरा मडराने लगा है.
संस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक देवभूमि उत्तराखंड आज अपना स्वरुप खोटी जा रही है. प्रदेश की पहचान यहाँ के मन्दिर है, लकिन आधुनिक समय में वह अपनी पहचाने खोटी जा रही है. आज मंदिरों का स्वरुप विकृत हो गया है. देखा देखि लोग बेतहासा मन्दिर बना रहे है और कही भी देवताओं को इस्थापित कर रहे है. जबकि पहाड़ में मंदिरों की मूल आकृति धर्म विधि पूर्वक, विष्णु धरमोत्तर पूरण और सिल्प्सस्त्र के अनुसार बनाये जाती है.
उत्तराखंड के मन्दिर मुक्यताया पड़ी शैली के, जिनमे नगर शैली की झलक दिखाती है. इनका आकर पिरामिड जैसा होता है. यहाँ के देवालय पत्थारोँ के बनाये जाते थे, पूरे ध्हाचे को बनाना के लिए मिटटी, उरद (एक प्रकार की दल), गोअद, पनीर आदि के मिश्रण का प्रयोग किया जाता था. मंदिर के ऊपर पटल रखा जाता था तथा कभी-कभी धातु का उपयोग भी किया जाता था. लेकिन आज इनकी जगह ईट, टेल्स आदि ने ले ली है. जगह-जगह ऐसे मंदिरों की बढ़ा सी आ गई है. एन मंदिरू का न तो अपना कोई स्वरुप है, न ही महत्वा. आज हर जगह ऐसी मन्दिर बनने की होड़ सी लगी हुई है. मन्दिर बनाना के लिए प्रतिवर्ष लाखों रूपये फुख दिए जाते है. विधायक व संसद तो एन मामलों में लोगों से दो कदम आगे है. वह बिना सोचे लोगों के म्हणत की गाड़ी कमी के करोडों रूपये अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए फुख देते है. लेकिन कोई भी मंदिरों के एअतिहसिक महत्वा व पहाड़ की पहचाने को बचने के लिए प्रयास नही कर रहा. नई पिद्दी के लोग तो तिलेस, ईट से बने मंदिरों को ही अपनी पहचान मानाने लगे है.
हिमालयन सोकिएति फार हेरिटेज एंड आर्ट conjerveson संस्था के निदेसक अनुपम सह ने बताया की पड़ी शैली लुप्त होती जा रही है. कुछ एस्थानोँ में ही अब इस श्हैली के मन्दिर दिखाई देते है. अब गों तक भी यह तिलेस संस्कृति पहुच गई है. अब तो लोग आधुनिक दौर की चकाचोअद में अपनी विरासत खोते जा रहे है. उन्होअने बताया की इस एअतिहसिक धरोहरोँ को बचने के लिए यूधेस्त्तर पर कार्य कराने होगे. बिना सामुदायिक भागीदारी के प्राचीन मंदिरों का अस्तित्वा नही बचाया जा सकता है. कला संस्कृति के संरक्सक अनुपम सह इटली, इंग्लैंड, दक्सिन पूर्वी एशिया के देसों में सास्कृतिक धरोहरोँ व हस्त्शिल्पोँ को बचने का कार्य कर रहे है.
मन्दिर निर्माण में प्रतिवर्ष फुकें जाते है लाखोँ रूपये
आज हर जगह मन्दिर बनने की होड़ लगी हुई है. मन्दिर बनने के लिए प्रतिवर्ष लाखोँ रूपये फुखे जाते है. विधायक व सांसद तो एन मामलों में लोगों से दो कदम आगे है. वह बिना सोचे लोगों की गाड़ी कमी बिना सोच विचार किए अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए फुक देते है. लेकिन कोई भी मंदिरों के एअतिहसिक महत्वा व पहचाने को बचने के लिए कार्य नही कर रहा. नई पीडी के लोग तो तिएल्स के इन मंदिरों को ही अपने पहचान मानाने लगे है.
उत्तराखंड को पुराणों में देवताओं की भूमि कहा गया है, और इसकी पहचान यहाँ के देवालय है. लेकिन आजकल बनने वाले मन्दिर अपना पर्वतीय स्वरुप खोते जा रहे है. पुरानी पहाडी शैली के मंदिरों की जगह अब ईट, मार्बल व ता एल्ससे बने मंदिरों ने ले ली है. देवालायाओं के लगातार बदलते स्वरुप से पहाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत पार खतरा मडराने लगा है.
संस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक देवभूमि उत्तराखंड आज अपना स्वरुप खोटी जा रही है. प्रदेश की पहचान यहाँ के मन्दिर है, लकिन आधुनिक समय में वह अपनी पहचाने खोटी जा रही है. आज मंदिरों का स्वरुप विकृत हो गया है. देखा देखि लोग बेतहासा मन्दिर बना रहे है और कही भी देवताओं को इस्थापित कर रहे है. जबकि पहाड़ में मंदिरों की मूल आकृति धर्म विधि पूर्वक, विष्णु धरमोत्तर पूरण और सिल्प्सस्त्र के अनुसार बनाये जाती है.
उत्तराखंड के मन्दिर मुक्यताया पड़ी शैली के, जिनमे नगर शैली की झलक दिखाती है. इनका आकर पिरामिड जैसा होता है. यहाँ के देवालय पत्थारोँ के बनाये जाते थे, पूरे ध्हाचे को बनाना के लिए मिटटी, उरद (एक प्रकार की दल), गोअद, पनीर आदि के मिश्रण का प्रयोग किया जाता था. मंदिर के ऊपर पटल रखा जाता था तथा कभी-कभी धातु का उपयोग भी किया जाता था. लेकिन आज इनकी जगह ईट, टेल्स आदि ने ले ली है. जगह-जगह ऐसे मंदिरों की बढ़ा सी आ गई है. एन मंदिरू का न तो अपना कोई स्वरुप है, न ही महत्वा. आज हर जगह ऐसी मन्दिर बनने की होड़ सी लगी हुई है. मन्दिर बनाना के लिए प्रतिवर्ष लाखों रूपये फुख दिए जाते है. विधायक व संसद तो एन मामलों में लोगों से दो कदम आगे है. वह बिना सोचे लोगों के म्हणत की गाड़ी कमी के करोडों रूपये अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए फुख देते है. लेकिन कोई भी मंदिरों के एअतिहसिक महत्वा व पहाड़ की पहचाने को बचने के लिए प्रयास नही कर रहा. नई पिद्दी के लोग तो तिलेस, ईट से बने मंदिरों को ही अपनी पहचान मानाने लगे है.
हिमालयन सोकिएति फार हेरिटेज एंड आर्ट conjerveson संस्था के निदेसक अनुपम सह ने बताया की पड़ी शैली लुप्त होती जा रही है. कुछ एस्थानोँ में ही अब इस श्हैली के मन्दिर दिखाई देते है. अब गों तक भी यह तिलेस संस्कृति पहुच गई है. अब तो लोग आधुनिक दौर की चकाचोअद में अपनी विरासत खोते जा रहे है. उन्होअने बताया की इस एअतिहसिक धरोहरोँ को बचने के लिए यूधेस्त्तर पर कार्य कराने होगे. बिना सामुदायिक भागीदारी के प्राचीन मंदिरों का अस्तित्वा नही बचाया जा सकता है. कला संस्कृति के संरक्सक अनुपम सह इटली, इंग्लैंड, दक्सिन पूर्वी एशिया के देसों में सास्कृतिक धरोहरोँ व हस्त्शिल्पोँ को बचने का कार्य कर रहे है.
मन्दिर निर्माण में प्रतिवर्ष फुकें जाते है लाखोँ रूपये
आज हर जगह मन्दिर बनने की होड़ लगी हुई है. मन्दिर बनने के लिए प्रतिवर्ष लाखोँ रूपये फुखे जाते है. विधायक व सांसद तो एन मामलों में लोगों से दो कदम आगे है. वह बिना सोचे लोगों की गाड़ी कमी बिना सोच विचार किए अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए फुक देते है. लेकिन कोई भी मंदिरों के एअतिहसिक महत्वा व पहचाने को बचने के लिए कार्य नही कर रहा. नई पीडी के लोग तो तिएल्स के इन मंदिरों को ही अपने पहचान मानाने लगे है.
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