· पहले से ही १०२ नम्बर पर है एंबुलेंस की सुविधा
आपातकालीन सेवा १०८ का श्रेय लेने के लिए भाजपा, कांग्रेस में होड़ मची हुई है. लेकिन पार्टिया जमीनी हकीकत से कोसों दूर है. हकीकत यह है की सरकार ने बदहाल होती चिकित्सा व्यवस्था को छुपाने के लिए अमरीकी तर्ज ९११ पर आपातकालीन सेवा १०८ चलाई है. बड़े-बड़े दावे कर शुरू की गई यह सेवा मात्र एंबुलेंस बन कर रह गई है, जो मात्र मरीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान में ले जाने का काम कर रही है. जबकि चिकित्सा विभाग के पास पहले से ही यह सुविधा मौजूद है, अस्पतालोँ में १०२ नम्बर डायल करने पर एंबुलेंस सेवा २४ घंटे उपलब्ध रहती है.
प्रदेश में सबसे बुरा हाल चिकित्सा व्यवस्था का है. न तो चिकित्सक ही है, न ही कोई चिकित्सा व्यवस्था.सरकार ने अपनी नाकामियों को छुपाने व बढते जनदबाव के कारण अमरीकी तर्ज में आपातकालीन सेवा १०८ लॉन्च कर दी. सरकार ने इस योगदान को उपलब्धि बताते हुई चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांति बताया. लेकिन बिना चिकित्सकों के यह आपातकालीन सेवा ऊँट के मुह में जीरा ही साबित हो रही है. आपातकालीन सेवा १०८ के शुरू होने से फले सरकार ने जो दावे किए थे, उन दावों के अनुरूप यह सेवा मात्र एक सामान्य एंबुलेंस बनकर रह गई है, जो मात्र मरीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान में ले जाने का काम कर रही है.
पहाड़ की दुर्गम पहाडी क्षेत्र में यह सेवा बेकार ही साबित हो रही है.
१०८ सेवा को एक साल बीत गया है. वर्तमान में आपातकालीन सेवा १०८ के बीडे में ९० गाडिया है. जिनमे ७८ बी एल एस (बेसिक लाएफ़ सपोर्ट) व १२ ऐ एल एस (एडवांस्ड लाएफ़ सपोर्ट ) गाडिया है. लगभग १० लाख कीमत की बी एल एस गाड़ी में एक आक्सीजन सिलेंडर व फस्ट एड सामान व दवाईया रहती है, जबकि १५ लाख कीमत की ऐ एल एस गाड़ी में वेंटिलेटर, देफेबुलाटर (ह्रदय की जाच करने की मसीन) लगी रहती है. इस सेवा को लंच करने के बाद सरकार ने इसे इ ऍमआर आई का नाम दिया. गैर सरकारी संस्था को लाभ देने की नियति से चलाई गयी यह सेवा आम ग्रामीणों कोई लाभ देती नही दिखाई दे रही है. एक हकीकत यह भी है की पहाड़ में ऐसे विसम भोगोलिक स्थितिया है जहा कई गाँव सडको से कोसों दूर है. वहा आज भी महिलाये प्रसव पीडा के कारन असमय कल का ग्रास बन रही है. जिसके आकडे तक सरकार के पास उपलब्ध नही है.
अगर खर्च की बात करे तो इ एम् आर आई सेवा १०८ में प्रतिवर्ष लाखों रुपये फूके जा रहे है. पिछले एक साल में १०८ सेवा के लिए अब तक २२.५ करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके है. प्रतिमाह इस सेवा के संचालन के लिए एक गाड़ी में लगभग १ लाख रुपये खर्च हो रहा है. योगना में ९५ प्रतिसत खर्च सरकार व ५ प्रतिसत खर्च en जी ओ वहां करता है. जो सरकारी कोष में अतिरिक्त बोझ के सिवाय कुछ और नही है. जबकि प्रदेश में पहले से ही नाम मात्र के खर्चे में आपातकालीन सेवा १०२ चल रही है, लेकिन सरकारी योजनाओं की तरह यह योजना भी धरातल में उतर नही पाई.
अगर चिकित्सा व्यवस्था का हल देखे तो राज्य में २३२ प्राथमिक स्वास्थय केन्द्र, ५५ सामुदायिक स्वास्थय केन्द्र व प्रत्येक जिले में जिला या बसे चिकित्सालय मौजूद है. लेकिन इन अस्पतालाओं में २१२५ चिकित्सकों के अनुरूप लगभग ११०० ही डाक्टर मौजूद है. फार्मेसिस्ट व पेरामेडिकल का तो और भी बुरा हाल है. पहाड़ के कई अस्पताल तो एक फार्मेसिस्ट के भरोसे ही चल रहे है. अगर मानकों की बात करे तो प्राथमिक स्वास्थय केन्द्र में १ डॉक्टर व ३ अन्य तकनीकी कर्मचारी होने चाहिए, और सामुदायिक स्वास्थय केन्द्र में १ महिला चिकित्सिका, १ बल रोग विसेसग्य, १ एनेस्थीसियं व एक फिजिसियन होने चाहिए। लेकिन हाल यह है की जिले के बेस अस्पतालाओं में ही विसेस्ग्य चिकित्सकों की भारी कमी है. पहाड़ में लगभग ५ किलोमीटर की परिधि में एक प्राथमिक स्वास्थय केन्द्र है’ लेकिन चिकित्सकों के आभाव में यह के लोग दूसरे एस्थानों में जाकर इलाज कराने को मजबूर है. चाहे वह कितना ही छोटा मर्ज क्यों न हो.
ऐसे में आप सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है की सरकार आपातकालीन सेवा की उपलब्धि के कैसे खोखले दावे करने में लगे हुई है. अगर सरकार की नियत आम लोगों को स्वास्थय सुविधा देने की होती तो आपातकालीन सेवा 108 में करोडोँ खर्च करने के बजे दुर्गम पहाडी क्षेत्र में चिकित्सकों की व्यवस्था करती, जो आम लोगो की पहली जरुरत है. वर्तमान में भी १०८ सेवा की तर्ज में सभी अस्पतालों में आपातकालीन सेवा १०२ मौजूद है. अगर सरकार आम लोगो के पैसे का सही इस्तेमाल करना चाहती तो वह १०८ पैर धन का दोरुप्योग करने के बजे इन एंबुलेंस को सही कराती. जनप्रतिनिधि सस्ती लोकप्रियता पाने के चाकर में १०८ सेवा का सच भूल गई. इसलिए वह आज स्वास्थय के क्षेत्र में क्रांति की बात कर लोगों को bhatakaane में लगी हुई है.
से कोसों दूर है पहाड़ के ७० फीसदी गाँव
आपातकालीन सेवा में एक भी चिकित्सक नही
आपातकालीन सेवा १०२ पहले से मौजूद