Thursday, September 17, 2009


बदहाल चिकित्सा व्यवस्था को छुपाने के लिए अमरीकी तर्ज पर चलाई १०८ सेवा

श्रेय लेने की होड़ में भूल गए १०८ का सच
· पहले से ही १०२ नम्बर पर है एंबुलेंस की सुविधा

आपातकालीन सेवा १०८ का श्रेय लेने के लिए भाजपा, कांग्रेस में होड़ मची हुई है. लेकिन पार्टिया जमीनी हकीकत से कोसों दूर है. हकीकत यह है की सरकार ने बदहाल होती चिकित्सा व्यवस्था को छुपाने के लिए अमरीकी तर्ज ९११ पर आपातकालीन सेवा १०८ चलाई है. बड़े-बड़े दावे कर शुरू की गई यह सेवा मात्र एंबुलेंस बन कर रह गई है, जो मात्र मरीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान में ले जाने का काम कर रही है. जबकि चिकित्सा विभाग के पास पहले से ही यह सुविधा मौजूद है, अस्पतालोँ में १०२ नम्बर डायल करने पर एंबुलेंस सेवा २४ घंटे उपलब्ध रहती है.
प्रदेश में सबसे बुरा हाल चिकित्सा व्यवस्था का है. न तो चिकित्सक ही है, न ही कोई चिकित्सा व्यवस्था.सरकार ने अपनी नाकामियों को छुपाने व बढते जनदबाव के कारण अमरीकी तर्ज में आपातकालीन सेवा १०८ लॉन्च कर दी. सरकार ने इस योगदान को उपलब्धि बताते हुई चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांति बताया. लेकिन बिना चिकित्सकों के यह आपातकालीन सेवा ऊँट के मुह में जीरा ही साबित हो रही है. आपातकालीन सेवा १०८ के शुरू होने से फले सरकार ने जो दावे किए थे, उन दावों के अनुरूप यह सेवा मात्र एक सामान्य एंबुलेंस बनकर रह गई है, जो मात्र मरीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान में ले जाने का काम कर रही है.
पहाड़ की दुर्गम पहाडी क्षेत्र में यह सेवा बेकार ही साबित हो रही है.
१०८ सेवा को एक साल बीत गया है. वर्तमान में आपातकालीन सेवा १०८ के बीडे में ९० गाडिया है. जिनमे ७८ बी एल एस (बेसिक लाएफ़ सपोर्ट) व १२ ऐ एल एस (एडवांस्ड लाएफ़ सपोर्ट ) गाडिया है. लगभग १० लाख कीमत की बी एल एस गाड़ी में एक आक्सीजन सिलेंडर व फस्ट एड सामान व दवाईया रहती है, जबकि १५ लाख कीमत की ऐ एल एस गाड़ी में वेंटिलेटर, देफेबुलाटर (ह्रदय की जाच करने की मसीन) लगी रहती है. इस सेवा को लंच करने के बाद सरकार ने इसे इ ऍमआर आई का नाम दिया. गैर सरकारी संस्था को लाभ देने की नियति से चलाई गयी यह सेवा आम ग्रामीणों कोई लाभ देती नही दिखाई दे रही है. एक हकीकत यह भी है की पहाड़ में ऐसे विसम भोगोलिक स्थितिया है जहा कई गाँव सडको से कोसों दूर है. वहा आज भी महिलाये प्रसव पीडा के कारन असमय कल का ग्रास बन रही है. जिसके आकडे तक सरकार के पास उपलब्ध नही है.
अगर खर्च की बात करे तो इ एम् आर आई सेवा १०८ में प्रतिवर्ष लाखों रुपये फूके जा रहे है. पिछले एक साल में १०८ सेवा के लिए अब तक २२.५ करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके है. प्रतिमाह इस सेवा के संचालन के लिए एक गाड़ी में लगभग १ लाख रुपये खर्च हो रहा है. योगना में ९५ प्रतिसत खर्च सरकार व ५ प्रतिसत खर्च en जी ओ वहां करता है. जो सरकारी कोष में अतिरिक्त बोझ के सिवाय कुछ और नही है. जबकि प्रदेश में पहले से ही नाम मात्र के खर्चे में आपातकालीन सेवा १०२ चल रही है, लेकिन सरकारी योजनाओं की तरह यह योजना भी धरातल में उतर नही पाई.
अगर चिकित्सा व्यवस्था का हल देखे तो राज्य में २३२ प्राथमिक स्वास्थय केन्द्र, ५५ सामुदायिक स्वास्थय केन्द्र व प्रत्येक जिले में जिला या बसे चिकित्सालय मौजूद है. लेकिन इन अस्पतालाओं में २१२५ चिकित्सकों के अनुरूप लगभग ११०० ही डाक्टर मौजूद है. फार्मेसिस्ट व पेरामेडिकल का तो और भी बुरा हाल है. पहाड़ के कई अस्पताल तो एक फार्मेसिस्ट के भरोसे ही चल रहे है. अगर मानकों की बात करे तो प्राथमिक स्वास्थय केन्द्र में १ डॉक्टर व ३ अन्य तकनीकी कर्मचारी होने चाहिए, और सामुदायिक स्वास्थय केन्द्र में १ महिला चिकित्सिका, १ बल रोग विसेसग्य, १ एनेस्थीसियं व एक फिजिसियन होने चाहिए। लेकिन हाल यह है की जिले के बेस अस्पतालाओं में ही विसेस्ग्य चिकित्सकों की भारी कमी है. पहाड़ में लगभग ५ किलोमीटर की परिधि में एक प्राथमिक स्वास्थय केन्द्र है’ लेकिन चिकित्सकों के आभाव में यह के लोग दूसरे एस्थानों में जाकर इलाज कराने को मजबूर है. चाहे वह कितना ही छोटा मर्ज क्यों न हो.
ऐसे में आप सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है की सरकार आपातकालीन सेवा की उपलब्धि के कैसे खोखले दावे करने में लगे हुई है. अगर सरकार की नियत आम लोगों को स्वास्थय सुविधा देने की होती तो आपातकालीन सेवा 108 में करोडोँ खर्च करने के बजे दुर्गम पहाडी क्षेत्र में चिकित्सकों की व्यवस्था करती, जो आम लोगो की पहली जरुरत है. वर्तमान में भी १०८ सेवा की तर्ज में सभी अस्पतालों में आपातकालीन सेवा १०२ मौजूद है. अगर सरकार आम लोगो के पैसे का सही इस्तेमाल करना चाहती तो वह १०८ पैर धन का दोरुप्योग करने के बजे इन एंबुलेंस को सही कराती. जनप्रतिनिधि सस्ती लोकप्रियता पाने के चाकर में १०८ सेवा का सच भूल गई. इसलिए वह आज स्वास्थय के क्षेत्र में क्रांति की बात कर लोगों को bhatakaane में लगी हुई है.

से कोसों दूर है पहाड़ के ७० फीसदी गाँव
आपाताकालीन सेवा १०८ की प्राथमिकता पहाड़ में प्रसव से पीड़ित महिला का इलाज करना है. लेकिन जमीनी हकीकत है की पहाड़ के ७० फीसदी गाँव सद्कोँ से कोसों दूर है. आज भी कई लोग इलाज के आभाव में असमय कल का ग्रास बनते है.

आपातकालीन सेवा में एक भी चिकित्सक नही
नक़ल के लिए अक़ल का होना जरुरी है. सरकार ने अमरीकी तर्ज में आपातकालीन सेवा तो सुरू कर दी, लेकिन इस सेवा में न तो कोई चिकित्सक है, न ही अत्याधुनिक उपकरण.

आपातकालीन सेवा १०२ पहले से मौजूद
आपातकालीन सेवा१०८ को चिकित्सा क्षेत्र में क्रांति कहने वाले उन नेतओं को बताते चले की प्रदेश में पहले से ही आपातकालीन सेवा १०२ मौजूद है. १०२ नम्बर को डायल करने पर आज भी यह सेवा उपलब्ध है. इसके बाद भी इस योगना को सुरू करने में क्या नियति रही इसका सही जबाब तो सरकार के प्रतिनिधि ही बेहतर दे सकते है.

Sunday, September 13, 2009

uttarakhand


बढते पलायन ने बदला पहाड़ का राजनैतिक भूगोल

पिछले पाँच सालो में पर्वतीय क्षेत्रो की घटी आबादी
• राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक रूप से कमजोर हो रहे पहाड़ का कोई नही है सुधलेवा


हाड़ से लगातार हो रहे पलायन से जहाँ गाँव के गाँव वीरान हो गए है, वही इसने पहाड़ के संसदीय क्षेत्रो का भूगोल बदल दिया है. इस लोकसभा चुनाव में पहाड़ के लोकसभा सीटों के मानको को पूरा करने के लिए दूसरे क्षेत्रो के विधानसभा क्षेत्र को जोड़ा गया है. विशेषज्ञों का मानना है की अगर पहाड़ से ऐसे ही पलायन बढता रहा तो, जहा नए परिसीमन से पहाड़ की सीटें घट गई है, वही २०२५ में होने वाले लोकसभा पुनर्गठन से पहाड़ की लोकसभा सीटें बढने के बजाय घट जायेगी.
बढते पलायन के कारण पहाड़ राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक रूप से लगातार कमजोर होते जा रहा है. एक अध्ययन के अनुसार प्रदेश के पर्वतीय जिलो पिथोरागढ़, चम्पावत, बागेश्वर, टीहरी, पौडी , अल्मोरा, बागेश्वर, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग , नैनीताल आदि से प्रतिवर्ष लगभग ४० हजार लोग पलायन कर रहे है. यह संख्या घटने के बजाय लगातार बढती जा रही है. राजनैतिक रूप से देखें तो पहाड़ लगातार कमजोर होते जा रहा है. परिसीमन के बाद जहा पहाड़ की सीटें घट गई है, वही इसका प्रभाव प्रदेश की पांचों संसदीय क्षेत्रों में भी देखने को मिला. २००९ के लोक सभा चुनाव में बढते पलायन ने पाँचों संसदीय क्षेत्रों का भूगोल ही बदल दिया है. अगर पलायन पर गौर करे तो स्थिति अपने आप ही साफ हो जाती है। अल्मोरा -पिथौरागढ़ संसदीय क्षेत्र में पिछले पाँच सालों में १९,१०८ मतदाताओ ने पहाड़ छोड़ दिया है. पौडी संसदीय क्षेत्र से २० हजार, टिहरी लोकसभा से १६ हजार मतदाता पलायन कर चुके है। नैनीताल लोकसभा सीट की बात करे तो यहाँ के ७० फीसदी मतदाता भाबर क्षेत्र में निवास करते है. अगर पूरे प्रदेश के मतदाताओं की संख्या पर गौर करे तो ५३ फीसदी मतदाताओ की संख्या अकेले तीन जिलों हरिद्वार, उधमसिह नगर व देहरादून में है. जबकि पहाड़ के १० पर्वतीय जिलों में इनकी संख्या २७ लाख ही रह गई है.
पहाड़ के पलायन पर अध्ययन कर रहे प्रोफेसर रघुवीर चंद्र ने बताया की जिस पर्वतीय राज्य की अवधारना को लेकर राज्य का निर्माण किया गया था वह सिद्धांत खत्म होते जा रहा है. पहले परिसीमन से पहाड़ की ६ विधानसभा सीटें कम हो गई है, अब लोकसभा सीटें सिकुड़ती जा रही है। अगर पहाड़ से इसी तरह पलायन बढता रहा तो आगामी लोकसभा पुनर्गठन में पहाड़ की सीटें बढने के बजाय घट जायेगी.
लगातार बढ रहे पलायन से पहाड़ के पहाड़ खाली हो गए है। गाँवों के खाली होने से सामाजिक ताना बाना भी कमजोर हुआ है. जिसने की अर्थव्यवस्था की नींव हिला दी है. पत्रकार बीड़ी कसनियाल ने बताया की राज्य बनने के बाद से किसी भी सरकार ने पहाड़ की सबसे ज्वलंत समस्या पलायन की ओर कोई ध्यान नही दिया. सरकार के प्रतिनिधि पहाड़ को बचाने में असफल ही दिखाई दिए है.

Saturday, September 12, 2009

Abhiyaan





उग्र सवभाव ने बनाया पूर्वी नंदादेवी को सबसे दुर्गम चोटी

अपने उग्र स्वाभाव के कारण पूर्वी नंदादेवी चोटी पर्वतारोहियों के लिए दुर्लभ बनी हुई है. यहाँ अब तक कई अभियान चले लकिन बिरले ही एस चोटी पर चड़ने में सफल हो सके. पूर्वी नंदादेवी अभियान के दौरान दर्जनों पर्वतारोही अपनी जान गवा चुके है.

उत्तराखंड की सबसे दुर्गम चोटी नंदा देवी है. एस चोटी पर पहुचने का दुर्गम सफर परवातारोहियो के लिए आज भी चुनोती बना हुआ है. नंदा देवी का पूर्वी छोर तो आज भी रहस्यमयी बनी हुई है. ७४३४ मीटर उच्चे पूर्वी नंदादेवी चोटी १९३९ में सबसे पहले पोलैंड के परवातारोही दल ने फतह की. ऐडम कपर्निकी के नेतृत्व में जे लेनर, जे बुजांग और डी सेरिंग इस चोटी पर दक्षिणी -पूर्वी छोर से चडे । इसके बाद १९५१ में फ्रेंच परवातारोही दल मुक्य चोटी और पूर्वी नंदा देवी पर फतह करने निकला. टीम लीडर रोजर दुप्लात और गिल्बर्ट तो रास्ते में ही लापता हो गए. कुछ साल बाद इन पर्वतारोहियों को ढूडने की कोशिस की गई लेकिन कोई पता नही चल पाया. प्रसिद्द परवातारोही तेनजिंग नोर्गे ने इस चोटी को माउंट एवरेस्ट से भी खतरनाक चोटी बताया.

एस घटना के २४ साल बाद १९७५ में भारत -फ्रेंच का १३ सदस्यीय सयुक्त परवातारोही दल मुख्य व पूर्वी नंदा देवी अभियान को निकला. लेकिन यह दल असफल रहा. इसके बाद १९८१ में भारतीय सेना ने मुख्य व पूर्वी नंदा देवी पर सफलतापूर्वक चढाई की, लेकिन लौटते समय दल के प्रमुख सदस्य प्रेमजीत लाल,फुदोर्गी, दया चाँद, राम सिंह, लाखा सिंह मारे गए. इस अभियान के बाद १९९१ में भारत-रूस के १४ सदयीय दल ने पूर्वी नंदा देवी पर चड़ने में सफलता पाई. इस अभियान में १० रुसी व ४ भारतीय सदस्य मौजूद थे. २००५ में ९ सदस्यीय इटालियन टीम मार्को पाउलो के नेतृत्व में नंदा देवी (ईस्ट) अभियान में गया. लेकिन अभियान असफल रहा, इस दौरान टीम लीडर मार्को पाउलो मारे गए. २००६ में स्पेन का एक परवातारोही दल चोटी पर चड़ने को निकला, लकिन ख़राब मौसम के कारण दल आधे रास्ते से ही वापस लौट आया. ३१ अगस्त को कुमाऊ रेजिमेंट का २५ सदस्सियीय पर्वतारोही दल दक्षिण -पूर्वी छोर से पूर्वी नंदा देवी अभियान पर निकला, अभियान असफल रहा. इस दल के ५ सदस्य टीम लीडर स्यामल सिन्हा , सूबेदार लाल सिंह, हवालदार मोहन सिंह, लांसनायक सुरेन्द्र सिंह बम मारे गए. इसी साल ४ सदस्यीय परवातारोही दल मौसम बिगड़ने के कारण वापस लौटा.

पर्वतारोही व कई चोटी फतह कर चुके सुमित गोयल ने बताया की किसी भी पर्वत पर चड़ने से पहले उसके स्वभाव को जानना अहम् होता है. पूर्वी नंदा देवी चोटी का स्वभाव सभी हिमालयी चोटियों में सबसे उग्र है. यहाँ हर समय बड़ी तेजी से मौसम बदलता है, जिस कारण इस चोटी में चड़ना आज भी चुनौती बना हुआ है. उन्हने बताया की १९८२ में नंदा देवी के पश्चिमी भाग को अभ्यारण्य घोषित कर दिए जाने के बाद पर्वतारोहियों के लिए दक्षिण पश्चिमी मार्ग बंद कर दिया गया. पहले इस मार्ग से पर्वतारोही पूर्वी नंदा देवी अभियान में जाते थे. मार्ग बंद होने के बाद पर्वतारोही पूर्वी नंदा देवी अभियान के लिए दक्षिण-पूर्वी और पूर्वी मार्ग का प्रयोग करते है. तीव्र ढलान के कारण यह मार्ग बेहद खतरनाक है.

पूर्वी नंदा देवी चोटी पर प्रमुख अभियान

· १९३९ में पोलैंड के पर्वतारोही दल का सफलतापूर्वक अभियान .

· १९५१ में फ्रेंच पर्वतारोही दल के ३ सदस्य लापता.

· १९७५ में भारत-फ्रांस का सयुक्त पर्वतारोहण असफल.

· १९८१ में भारतीय सेना का अभियान सफल, ५ की मौत

· १९९१ में भारत-रूस का सयुक्त पर्वतारोहण सफल

· २००५ में इटली का पर्वतारोहण असफल

· २००६ में स्पेन का पर्वतारोही दल असफल.

· २००७ में भारतीय सेना का अभियान असफल, ५ की मौत

२००७ इटली का पर्वतारोहण असफल